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रविवार, 10 फ़रवरी 2013

कां है रै दौड़



कां है रै दौड़
भलि छै कुशल बात, ना्न-तिन
अयांण-सयांण, धिनाई-पांणि
घर-दौंड़, भितर-भ्यार
बंण-जङव, हा्व-पांणि
ढोर-डंगर, फसल-पा्ति
बुति-धांणि......
आ्ब कि पुछछा
ककैं छु पत्त
बस है रै दौड़
कां हुं ? न्है पत्त ।

सब भा्जणईं-पड़ि रै भजा-भाज
निकइ रौ गाज
करंण में छन सिंटो्इ सिंगार
अगी रौ भितर-भ्यार।

क्वे आपूं ज कै कैं न चितूंणया
क्वे मैंस कैं क्वे मैंस न मिलणंय
क्वे ज्यून कैं क्वे ज्यून न मिलणंय
क्वे सच्च कैं क्वे सच्च न मिलणंय
क्वे हिंदुस्तानि कैं क्वे हिंदुस्तानि न मिलणंय
क्वे पहाड़ि कैं क्वे पहाड़ि न मिलणंय....

फिर उं सयांण कूंणी आपूं कैं (?)
छा्र फो्कि
ढुनणईं मुक्ति-शांति....
जां न ज्यूनि छु
न मैंस...न सच्चाइ...न मौतै ऽ
जां जि छु, कि न्है
को् कै सकूं पुर भरोषैल
कि मिलौ्ल वां
छा्र, सिफर अलावा और के ?

पर छा्र सिफर है लै ठुलि
न ह्वैलि‘ई क्वे दौड़
संतोष है महासंतोष
शांति है निःश्वास शांति
मुक्ति है महामुक्ति ?