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शनिवार, 9 जनवरी 2010

झूठ-सच




कौन मानेगा मेरी सच 
जब मैं कहूँगा-
सच होता है कई प्रकार का. 


सोते हुए पीठ के नीचे धरती 
खड़े होते हुए पांवों के नीचे धरती
और चन्द्रमा में जाकर हो सकता है
सर के ऊपर हो धरती,


तो हुआ न सच कई प्रकार का ?


सोते हुए का सच अलग, जागे हुए का सच अलग
बैठे, खड़े व 'उठे' हुए के सच भी अलग अलग
आँखों देखा, कानों सुना
हाथों से छुवा, जीभ से चखा, 
तोड़ा-मरोड़ा सच भी अलग
फिर पुराना सच-नयां सच
झूठा सच-सच्चा झूठ


और एक वह सच भी
जो पापा ने झूठ सिखाया था
"सच पुण्य और झूठ बोलना पाप"


सच बोलना तो आजकल
हो गया है सबसे बड़ा पाप 
हो रहा है नीलाम हर चौराहे में 
द्रौपदी की चीर की तरह
ठहर नहीं पा रहा
झूठ की ताकत के समक्ष 


कौन मानेगा मेरी सच
जब में कहूँगा-
भगवान भी होते हैं 
दो प्रकार के


एक वे 
जो हमें पैदा करते हैं,
और दूसरे वो
जिन्हें हम पैदा करते हैं
उनकी मूर्ति बना 
कोइ देख रहा हो तो 
जोर जोर से
पहले सर और फिर
पूरे शरीर को भी झूमाकर
जय-जय कर नाचते भी हैं,
खुद भी देवता बन जाते है,
बड़े-बड़े उपदेश देते हैं 
जो जितना चढ़ावा चढ़ाये 
उतना ही प्रसाद देते हैं, 
वी. आई. पी. आ जायें तो 
उन्हें अन्दर लाने
खुद मंदिर से बाहर भी निकल आते हैं.
परेशान लोगों के दुःख हरने के बदले
मुर्गियां-बकरियां मांगते हैं,
उनके नाम पर राजनीति करते हैं...दुकान चलाते हैं....










......नवीन जोशी 
(मेरी कुमाउनी कविता 'झुठी-सांचि' का भावानुवाद )

2 टिप्‍पणियां:

  1. कतुक भल हूनो अगर दगडे़ दगडे़ कुमाउँनी कविता ले दी दीना हो जोश्जू

    अभी मुर्गी बकरी तक ही हैं
    गनीमत है
    मनुष्य भी हो सकते हैं ।

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  2. ulook ज्यू, आपण नों त बतै दियो, फिर बात होलि. उसी तुमार कमेंट्स म्येरि कविता है लै बांकि भाल छन हो. अल्मोड़ी चाल झन दिखाओ, हमूल लै भौत नापि राखीं तुमार 'माल, बाल, पटाल'

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